स्ट्रोक - गलत धारणाएं और वास्तविकता

स्ट्रोक के बारे में  जनसामान्य में बहुत गलत  धारणाएं प्रचलित हैं।  स्ट्रोक की समझ कम लोगों में है ,  यहां तक ​​कि संयुक्त राज्य अमेरिका जैसे “उन्नत” समाजों में भी।

भारत में भी अमेरिका की तरह ही यह गलतफहमियां हैं।  लेकिन भारत में अंधविश्वास, नीमहकीम, फ़क़ीर आदि भी हैं जिससे स्थिति और बिगड़ती है।

तो आइये इन गलतफ़हमियों  और सच्चाई दोनों को जानें। 

गलत धारणा : स्ट्रोक को रोका नहीं जा सकता है। 

यह बिलकुल सच नहीं हैं । पाया गया है की 80% स्ट्रोकों को रोका जा सकता था।  कई बार स्ट्रोक से पहले स्पष्ट लक्षण दिखते हैं जैसे की उच्च रक्तचाप, मोटापा, डायबिटीज, धूम्रपान।  परिवार में स्ट्रोक का इतिहास इत्यादि ।

सकारात्मक आहार, जीवन शैली में बदलाव के साथ साथ नियमित व्यायाम और धूम्रपान छोड़ने से स्ट्रोक के जोखिम में काफी कमी आ सकती है।

गलत धारणा: स्ट्रोक 65 वर्ष से कम आयु के लोगों को नहीं होता है।

स्ट्रोक वास्तव में एक “समान अवसर” बीमारी है – कभी-कभी गर्भ में भी स्ट्रोक हो सकता हैं ! लगभग 25% स्ट्रोक 65 से कम और 10% स्ट्रोक 45 वर्ष से कम उम्र के लोगों के होते हैं। जैसे-जैसे जीवनशैली और जीवित रहने के दबाव बढ़ रहें  हैं, ये संख्या भी बढ़ रही है।

गलत धारणा : स्ट्रोक होने के बाद पहले कुछ महीनों में सुधार हो सकता है उसके बाद नहीं ।

वास्तव में स्ट्रोक के तुरंत बाद का समय बहुत महत्वपूर्ण होता है – कुछ लोग इस बात के लिए तीन साल की बाहरी सीमा निर्धारित करते हैं  और कहते हैं के इसके बाद सुधार नहीं हो सकता। 

लेकिन एक स्ट्रोक प्रभावित व्यक्ति पूरे जीवन तक सुधार पा  सकता है।  इसलिए  फिजियोथेरेपी , भाषा के लिए थेरेपी , सही दवाई इत्यादि को रोकना नहीं चाहिए।

हालांकि स्ट्रोक होने पर अगर पहले ४-६ घंटे ( जिन्हें गोल्डन ऑवर्स कहा जाता है) में  उचित उपचार शुरू हो जाए  तो बहुत अच्छा  स्ट्रोक से सुधार हो सकता है। 

गलत धारणा : स्ट्रोक दिल में होता है।

स्ट्रोक तब होता है जब मस्तिष्क के एक हिस्से को रक्त की आपूर्ति कम हो जाती है या काट दी जाती है। यह विभिन्न कारणों से हो सकता है। यह एक हृदय रोग के साथ इसलिए समझा जाता है क्योंकि स्ट्रोक के रोगियों में कई बार उच्च रक्तचाप भी होता है।

लेकिन स्ट्रोक का उपचार और उसके लिए विशेषज्ञ डॉक्टर दिल की बीमारियों का उपचार या डॉक्टर से पूरी तरह से अलग हैं। इसीलिए मस्तिष्क को प्रभावित करने वाले स्ट्रोक को चिकित्सकीय रूप से CVA (सेरेब्रोवास्कुलर अटैक) या सेरेब्रोवास्कुलर स्ट्रोक कहा जाता है।

दिल का दौरा ( हार्ट अटैक) भी कई बार कार्डियक स्ट्रोक के रूप में चिकित्सकीय रूप से बता दिया जाता है।  साथ ही, कार्डियक स्ट्रोक और सेरेब्रोवास्कुलर स्ट्रोक के बीच एक मजबूत संबंध है क्योंकि   हार्ट अटैक यानी  कि कार्डियक स्ट्रोक से  मस्तिष्की स्ट्रोक का खतरा बढ़ जाता है।

गलत धारणा: यदि आप दर्द में नहीं हैं, तो आपको स्ट्रोक नहीं है।

कई स्ट्रोक के रोगियों को बिल्कुल भी दर्द महसूस नहीं होता है। अधिक सामान्य लक्षणों में चक्कर आना और संतुलन खोना, बोलने में कठिनाई, हाथ पैर के अंतिम हिस्सों में सुन्नता और अपने आसपास के लोगों को समझने में परेशानी शामिल है। इसलिए बहुत जरूरी है कि हर कोई स्ट्रोक के सामान्य लक्षण पहचाने। 

गलत धारणा : स्ट्रोक परिवार में एक ही व्यक्ति को होता है ।

नहीं।  स्ट्रोक का खतरा उन लोगों के लिए बढ़ जाता है जिनके पास स्ट्रोक का पारिवारिक इतिहास है।

गलत धारणा : स्ट्रोक बहुत ही कम लोगों को होता है ।

बिलकुल नहीं।  माना जाता है कि अमेरिका में अभी तकरीबन ७० लाख व्यक्ति स्ट्रोक से पीड़ित हैं ( मृतकों के अलावा) और उस देश में मौत का पांचवां प्रमुख कारण स्ट्रोक है।

दुनिआ भर में स्ट्रोक मौत का प्रमुख कारण है. लगभग 9 प्रतिशत मौतों के लिए स्ट्रोक जिम्मेदार है। अब यह माना जा रहा है कि हर चार में से एक व्यक्ति को उसके जीवन काल में स्ट्रोक होगा। 

भारत में, जैसा कि इस पोस्ट में बताया गया है, स्ट्रोक के कारण होने वाली मौतें एचआईवी / एड्स की तुलना में 6.5 गुना अधिक हैं ! इस खबर के अनुसार भारत में स्ट्रोक 1996 में 12 वें कारण से 2016 में मृत्यु का 5 वाँ प्रमुख कारण बन गया है।  १००,००० में से ११९-१४५ व्यक्ति स्ट्रोक से ग्रस्त होते हैं जो की १९९६ के मुकाबले लगभग 100 प्रतिशत की वृद्धि है।

इसलिए निश्चित रूप से स्ट्रोक जागरूकता पैदा करने के लिए बहुत कुछ किया जाना चाहिए।

गलत धारणा : छोटे स्ट्रोक में चिकित्सा की आवश्यकता नहीं होती है।

प्रत्येक स्ट्रोक के लिए तत्काल   चिकित्सा की आवश्यकता होती है। शीघ्र उपचार जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर हो सकता है और गंभीर, दीर्घकालिक प्रभाव की जगह पूर्ण सुधार ला सकता है।

“छोटे” स्ट्रोक को चिकित्सकीय रूप से ट्रांसिएंट इस्केमिक अटैक (टीआईए) कहा जाता है। यदि इस को अनदेखा कर दिया जाता है तो स्ट्रोक बड़े पैमाने पर आघात कर सकता है जिससे से अपूरणीय क्षति हो सकती है। 

गलत धारणा : स्ट्रोक से बचे लोगों हमेशा दूसरों पर निर्भर रहेंगे।  वह स्वतंत्र , सामान्य जीवन नहीं जी सकते ।

हालांकि कई स्ट्रोक प्रभावित कुछ हद तक दूसरों पर  निर्भर रहते हैं, बहुत लोग सही इलाज , आत्मविश्वास अवं लगातार प्रयत्नों से बहुत सुधार  पाते है  और एक सम्पूर्ण जीवन व्यतीत करते हैं

कृपया हमारे प्रेरणा अनुभाग पर जाएँ जहाँ हम   प्रेरक कहानियाँ प्रस्तुत करते हैं। और यदि आपके पास  भी ऐसा कोई अनुभव हैं तो हमें यहां बताएं। 

(उपरोक्त लेख के लिए कुछ जानकारी यहां से ली गई है: http://www.strokesmart.org/myths )

क्या आप किसी भी स्ट्रोक कि गलत धारणा के बारे में जानते हैं ? या ऐसा कुछ जो “सामान्य” उपचार के दायरे में नहीं है, लेकिन जो आपको लगता है कि स्ट्रोक के इलाज में कारगर है? हमें यहां बताऐ !

भारत में स्ट्रोक जागरूकता फैलाने में हमारी मदद करें ! कृपया इस लेख और वेबसाइट https://strokesupport.in/ को अपने दोस्तों में साझा करें – हो सकता है आप किसी को इस भयंकर बीमारी से बचा पाएं।  बहुत धन्यवाद !

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